सोमवार, 6 नवंबर 2017

अनुभव.......







चेहरे की लकीरें बयाँ करती हैं
जीवन के उस लम्बे सफ़र को
जिस पर चलते- चलते मनुष्य
स्वयं को थका हारा महसूस
करने लगता है
जहाँ रह जाती है चाह सिर्फ़
एक सहारे की....सम्मान की
उसकी भावनाओं को
समझने एवं महत्व देने की
ये लकीरें बयाँ करती हैं
उस शख़्स के जीवन के
उस लम्बे सफ़र की
जिसने न जाने कितने बसंत
गुज़ार दिये अपनी उस बगिया को
सँवारने में जिसके फूलों की
ख़ुशबू का आनंद
वह ले भी पायेगा
या नहीं इसका
उसको स्वयं पता नहीं
ये लकीरें विवश कर देती हैं
सोचने पर कि जीवन के इस
लम्बे संघर्ष के बाद भी
इतनी भीड़ में वो आज
अकेला क्यूँ ?
क्यूँ बिखर सी गयी है
वो माला जिसको गूथनें में
उसने अपना सारा जीवन
समर्पित कर दिया
आज माली को
उसी की बगिया में
कमी क्यूँ है अपने ही
फूलों की ?
रह रह कर कचोटता है
यही प्रश्न
जीवन में विसंगती क्यूँ ?




         अमिता शर्मा ‘ मीत ‘


रविवार, 5 नवंबर 2017

कल तक नासमझ थे आज समझाते हैं लोग ,
बहुत अज़ीज़ बनकर ज़िन्दगी में आते हैं लोग |

कल तक हमदर्दी थी जिनको ग़मों से मेरे ,
आज मुझको मिलने से नज़रें चुराते हैं लोग |